Tuesday, December 2, 2008

जागो देशवाशियों .....


मैथिलि शरण गुप्त जी ने अपनी कविता "एक फूल की चाह" के माध्यम से फूल की आकांक्षा इन शब्दों में व्यक्त की थी--

"
हे माली,मुझे तुम उस राह में देना फेक,
जिस पथ जाते वीर अनेक "


कितनी अजीब बात है,एक २६ तारिख थी जिस दिन हमने अंग्रेजों के चुंगल से आज़ादी प्राप्त की थी और एक यह २६ तारिख थी जिसने हमें यह एहसास दिला दिया की अब तक हम आतंकवाद के चुंगल में फसें हैं।
२६ नवम्बर २००८ को आतंकवादियों के एक दस्ते ने महारास्त्र की राजधानी मुंबई पर धावा बोल दिया.उन्होनें समुद्री रस्ते से मुंबई में प्रवेश किया और ११ जगह बम विस्फोट किया। फिर उन्होंने नरीमन हाउस और दक्षिण मुंबई स्थित ताज होटल और ओबेरॉय होटल में भारतीय और विदेशी नागरिकों को बंदी बनाकर रखा। विभिन्न सुरक्षा गुटों की संयुक्त कार्यवाही की बदौलत हमनें उन आतंकी पर फतह पाई। उनकी घृणित क्रिया-कलाप ने लगभग २०० निर्दोष मुंबई-वासियों की जान ले ली और हमारे १४ सुरक्षा कर्मी शहीद हो गए।

पर हमारी बात यहीं ख़त्म नही होता। यहीं से हमारा सोचना शुरू होता है।

इस जीत का जश्न तो पूरा देश मना रहा है पर ऐसी जीत का सेहरा किसे भाये जो सैकड़ों कफ़न की एवज में मिला हो। किसी के घर के कमाने वाले हाँथ कट गए,तो किसी बाप को अपने बेटे की चिता को आग देना पड़ा। शादी की तय्यारी में जुटे व्यक्ति को मौत का कफ़न मिला,तो किसी नवविवाहित को सफ़ेद साड़ी का तोहफा। जहाँ किसी वृद्ध माता-पिता ने अपने श्रवण कुमार को खोया,वहीं किसी मासूम से दशरथ-प्रेम छिन्न लिया गया।

ऐसे देखें तो यह हमारी हार है।एकता की हार है, राजतन्त्र की हार है. यह हमारी सरकार की नामर्दी का सबूत है। क्या हमारे सारे गुप्त सूचना संघटन ठप्प हो गए थे। इतनी बड़ी आतंकी घटना की जानकारी उनके हाँथ कैसे नही लगी? ज़रूर कहीं प्रशाशन की ही गलती है। गुजरात और उत्तर प्रदेश सरकार पुलिस ने यह सूचना भेजवायी थी की मुंबई में हमले की संभावना है,पर मुंबई प्रशाशन ने उसे नज़रंदाज़ कर दिया। यह प्रत्यक्ष है की इस गलती की भरपाई पूरे देश ने की। मुंबई मुख्य मंत्री श्री विलास राओ देशमुख किसी कैबिनेट बैठक में उपस्थित ना हों पर फिल्मी दुनिया की सभी कार्यक्रमों में नज़र जाते हैं। वाह रे आपकी सरकार !! इतनी बड़ी घटना हो गई है पर फिर भी राज ठाकरे अपनी नीच सोच का प्रदर्शन करने से नही चुके। उन्होंने वीरों को श्रद्धांजलि दी तो पर सिर्फ़ मराठा सैनिकों को। क्या दूसरे राज्य के सैनिकों ने अपने जान नहीं गावई ? विपक्ष दल बी.जे.पी ने तो इसे अपने चुनाव का प्रमुख विषय ही बना लिया और जहाँ उन्हें अभी सरकार का समर्थन करना चाहिए था वहीं अपने भाषणों में उन्हें गालियाँ देते रहे। नेता लोग या फिर भाषणों में अपना खेद प्रकट करते हैं,या कोई अनुदान घोषित कर देते हैं,या अगर उनकी कृपा-दृष्टि रहती है तो उनके परिवार से मिलकर खेद व्यक्त करते हैं।पर क्या यहीं है उनका उत्तरदायित्व ? अगर उन्होनें अपना काम ठीक से किया होता तोह ऐसी नौबत ही नही आती। और अगर यह कम रहा तो कुछ तो यह भी कहने से नही चुकते की ,"अगर उन सैनिकों ने देश के लिए जान नही दी होती तो उनके घर के बहार कुत्ते भी नहीं भटकते।" यह तो बेशर्मी की हद्द है। हम उन्हें भाषण देने से नही रोकते,पर आपलोग कब तक हवा में बातें करते रहेंगे,कब तक खाली वादें करते रहेंगे...?अब वक्त गया है की आप कुछ कर की दिखाइए। या किसी नेता का इन हमलों में मरने का इंतज़ार करना पड़ेगा।
पर कहते हैं ना की ताली एक हाँथ से नही बजती। गति इसमें हमारी भी है। जनता अगर एक जुट हो जाए तो क्या मजाल इन राजनितिक नुमैन्दों की देश की सुरक्षा के साथ खेलें.पर क्या हमें एकता और राष्ट्र-प्रेम तभी याद आता है जब किसी आतंकी हमले से हमारी घाव ताजे रहते हैं।? जनता की आवाज़ तभी क्यों सुनाई देती है जब नुक्सान हो चुका होता है? जिस तरह एक अच्छे पुत्र का फ़र्ज़ रहता है माता-पिता की सेवा करना उसी तरह एक अच्छे नागरिक का फ़र्ज़ है अपने देश के प्रति जिम्मेदारियां पूरी करना.और हम अपनी जिम्मेदारी मतदान द्वारा निभा सकते हैं.आँख बंद कर के वोट देने से बहेतर है ,सभी दलों की मनिफेस्तो पढ़ें और फिर सोच समझ कर वोट दें।

हम चाहें तोह मिल कर एक अच्छे सरकार का निर्माण कर सकते हैं। भीड़ में खड़े हो कर सरकार और राजनीती को गालियाँ देना आसन है,पर हमें चाहिए वे लोग जो इस दलदल में प्रवेश कर कमल -रूपी परिणाम दे सकें.सभी आलोचना करने में नही चुकते,पर कोई राजनीती में जाकर इसे सुधरता नहीं.इसका परिणाम तो आप देख ही रहे हैं।धर्मं और राजनीती को कभी एक नज़र से नही देखना चाहिए। हमारी नेता अपना सारा समय धर्मं और जाती के नाम पर झगड़ने में व्यर्थ कर देते हैं। और तो और हमें भ्रस्ताचार रूपी राक्षस का अंत करना होगा। मुझे तो लगता है की राजनीती में रूचि रखने वाले नौजवानों को पहले नौकरी कर ,अपना घर बार और बैंक-बैलेंस जमा लेना चाहिए और फिर राजनीती में कदम रखना चाहिए। ताकि जब वो नेता बनें तो उन्हें धन का लोभ रहे और वो अपना समय देश की सेवा में लगा सकें।
इसके ऊपर हमारी सुरक्षा संगठनों को गाँठ बाँध लेनी चाहिए की ऐसी चुक दुबारा ना होने पाये। कोई भी जानकारी मिले तो तह तक उसकी छानबीन होनी चाहिए। एक फेडेरल एजेन्सी की स्थापना करने चाहिय जिसका सञ्चालन सीधे राष्ट्र सरकार के हांथों में हो। आज भी कुछ राज्य अपराधियों की लेन-देन कर झगरते रहते हैं। राज्य-स्तर पर किसी भी प्रकार का भेद-भावः नही होना चाहिए। भारत को पड़ोसियों के साथ और भी कड़क रवैया अपना चाहिए। हम कहते थे की लडाई आतंवाद से है आतंकवादियों से नही ,पर अब समय गया है ईंट का जवाब पत्थर से देने का।

बचपन की एक सीख याद आती है की घर में जब एक मेहमान आए तो उसका भगवान् की तरह आदर करना चाहिए,जब एक कुत्ता गलती की घुस आए तो उसे प्यार से भगा देना चाहिए पर जब एक लोमडी जाए तोह उसे लाठी से मार मार कर बहार खदेड़ देना चाहिए।
यह समय है की हम अपना उत्तरदायित्व पहचाने और आतंक से जूझते अपने भारत को रहत की साँस दें। आज हमारी दूध के क़र्ज़ को अदा करने की बारी है। और जब यह भारत राष्ट्र एकजुट हो जाएगा तब हम फौलाद को भी मोम की तरह मसल देंगे।

इस मुसीबत से हम तो उभर आए हैं पर हमें उन बहादुर सुरक्षा कर्मियों को नही भूलना चाहिए जिनकी बदौलत हम आज शुरक्षित हैं। यह ऐसे जांबाज़ थे जिन्हें अपनी भारत-माता से दूसरों से अधिक लगाव था,जो अपने वतन के लिए जान न्योंछावर करने से भी नहीं डरते थे।यह उन वीरों का ही बलिदान है की हम ने फिर एक बार आतंकवाद को मुह-तोड़ जवाब दिया है।

मैं अपने कलम से उन अनगिनत शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूँगा और उन सभी लोग जो देश के हित में लड़ते हैं उन्हें आदर नमन करता हूँ।

2 comments:

Anonymous said...

try to improve on the first paragraph.
good to see that you are conscious towards your society n concerned about the nation.....

keep the pen running..
maa.

RaSh said...

अपने दसवी के हिन्दी पेपर की याद आ गयी! :D

बेशक सरकार इसे रोकने में विफल रही, परन्तु आज ज़रूरत है समाज को धर्म, रंग इत्यादि से ऊपर उठने की! तभी आम लोग आसानी से आतंकवादी नहीं बनेंगे!

लिखते रहो! :)

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