नन्हे की किल्कारियों को दबा लेते हैं ये बम के धमाके,
और ध्वनि को अपने अस्तित्व पे शर्म आती है |
सृजन-देखन को तरसी ये निगाहें देखती हैं जिंदा लाशें,
और दृष्टि को अपने अस्तित्व पे शर्म आती है |
मेहेकती नालियों समीप पले-बडे तर्सते हैं फूलों की महेक को,
और गन्ध को अपने अस्तित्व पे शर्म आती है |
मधुरस को निहारती अबला बासी रोटियों से मन भरती है,
और स्वाद को अपने अस्तित्व पे शर्म आती है |
लड़ते-झगडते रहते हैं हम ज़िन्दा रहके भी जिन्दगी से,
और जिन्दगी को अपने अस्तित्व पे शर्म आती है |
